श्रीलंका ने चीन की एक पनडुब्बी को कोलंबो के बंदरगाह में रखने को लेकर की गई अपील को खारिज कर दिया है। उक्त जानकारी श्रीलंका सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने दी। 2014 में आखिरी बार किसी चीनी पनडुब्बी को कोलंबो बंदरगाह पर रखने की श्रीलंका सरकार द्वारा इजाजत दी गई थी जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के दौरे पर श्रीलंका आए हुए हैं।
श्रीलंका सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि श्रीलंका चीन की पनडुब्बी को किसी भी समय कोलंबो में रखने की अपील से ‘सहमत नहीं था’। इस संबंध में उन्होंने भारत की चिंताओं का भी जिक्र किया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अधिकारी ने अपना नाम नहीं बताया।
श्री लंका रक्षा मंत्रालय के एक और अधिकारी ने चीन की पनडुब्बी को कोलंबो के डॉकयार्ड में रखे जाने की अपील को खारिज किए जाने की पुष्टि की, हालांकि उन्होंने कहा कि भविष्य में पनडुब्बी को रखे जाने का फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। अधिकारी ने कहा, ‘ऐसा बाद में हो सकता है।’ उन्होंने बताया कि चीन ने ‘कुछ दिन पहले’ 16 मई के आसपास पनडुब्बी को बंदरगाह पर रखे जाने के लिए स्वीकृति मांगी थी। चीन के दूतावास के एक नजदीकी सूत्र ने इस बात की पुष्टि की है कि चीन ने अपनी पनडुब्बी को कोलंबो में रखने के लिए श्रीलंका सरकार से अपील की थी।
हाल के समयों को अगर देखा जाये तो चीन ने श्रीलंका के इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने में जैसे की एयरपोर्ट्स, सड़कें, रेलवे और बंदरगाह के निर्माण के लिए काफी निवेश किया है। ऐसा करने के पीछे उसका मकसद भारत के लिए (आर्थिक) अस्थिरता पैदा करना है जो पारंपरिक रूप से श्रीलंका का आर्थिक साझेदार रहा है। कोलंबो में 70 प्रतिशत जहाजों की आवाजाही भारत से होती है। वहीं श्रीलंका घाटे में चल रहे अपने हैमबैनटोटाटा बंदरगाह को चीन को 99 साल के लिए किराए पर देने की योजना पर अंतिम फैसला लेने के पक्ष में अपना कदम बढ़ा रहा है , हालांकि ट्रेड यूनियनों के विरोध की वजह से डील में देरी हो रही है।