इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री आरुषी हत्याकांड में शक की वजह से जेल काट रहे तलवार दंपती को हाईकोर्ट ने गुरुवार को बरी कर दिया। नौ साल की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद दोनों का आरोप साबित न होने की वजह से आरुषी और हेमराज (उस घर का नौकर ) की हत्या के आरोप से बरी हो गये। लेकिन सवाल अब भी बरकरार है कि, अगर आरूषि के माँ-पिता गुनाहगार नहीं हैं तो फिर आरूषि को किसने मारा?? यह गुत्थी पहेली बन गई है और पहेली ही रह जायेगी क्योंकि कानून अंधा और बहरा दोनों है।
नौ साल काफी लम्बा सफर होता है किसी भी वारदात की तह तक पहुंचने के लिए। पर जिन सबूतों के आधार पर यह सजा दी गई थी वो काफी कमजोर था, जिससे की संदेह का लाभ देते हुए हाईकोर्ट ने नुपुर और राजेश तलवार को बरी कर दिया।
सीबीआई की साख फिर एकबार ध्वस्त हो गई है…
सीबीआई जब घटना के सम्बन्ध में कोई ठोस साक्ष्य नहीं जुटा पाई थी तो फिर नौ साल इन्होंने किया क्या? इतने लंबे समय के बावजूद सुबूतों का उच्च न्यायालय में नहीं ठहरना सोचनीय, चिंतित और शक पैदा करने वाला विषय है।
सीबीआई को हमेशा जटिल मामले सौंपे जाते हैं जिनको सुलझाना पुलिस के लिए मुश्किल होता है।
15 मई 2008 की रात माँ-पिता के रहते बेटी का कत्ल हो जाता है और उनको पता भी नहीं चलता,, सबसे बड़ा शक तो यहीं सवाल पैदा करता है।सारे सबूत मिटाने की कोशिश, आरूषि का कमरा खुला कैसे था, पुलिस को पहले कत्ल की सुचना क्यों नहीं दी गई।इतने सारे सवाल का जवाब पुलिस महकमे से लेकर सीबीआई के आला अधिकारी सालो तलाशते रहे पर पहेली ज्यों की त्यों बनी रही। हम अभी भी सच आने का इंतजार कर रहे हैं , जानते हुये भी की सच कभी भी सामने नहीं आयेगा। अभी तक हम यहीं सोचते आये कि यह ऐसा मामला नहीं जिसमें किसी तरह का राजनैतिक दवाब है इसलिये फैसला निष्पक्ष आयेगा ? या वाकई तलवार दंपती बेगुनाह हैं?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद क्या हम ऐसा सोच सकते हैं?
कुछ प्रश्न रहते हैं अनुत्तरित—हमेशा।