नारी सशक्तिकरण पर अपने खुले ह्रदय के उदगार को प्रदर्शित करती एक कवयित्री

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नारी सशक्तिकरण को केंद्र बनाकर कविता लिखने वाली सीवान की आरती आलोक वर्मा उर्फ नीलू का नाम साहित्य के फलक पर किसी भी नाम और परिचय का मोहताज नहीं है , आरती आलोक वर्मा मंच से लेकर आकाशवाणी , दूरदर्शन और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से नारी को लेकार दर्द बयां तो करती ही हैं , बल्कि इनमे साहस जोश , जूनून भरने का भी कार्य करती हैं , आरती भूगोल से स्तात्कोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं , उनका कहना है कि नारी सशक्ति करण के लिए सबसे पहले समाज के जितने भी औरते हैं उन्हें ही आना होगा , स्वयं को स्थापित करना होगा , इसके लिए कोई भी क्षेत्र का चुनाव किया जा सकता है , और मैंने कविता -कहानी को इसका जरिया बनाया है जिससे कि मेरे अन्दर सकारात्मक दृष्टिकोण में दिन प्रतिदिन वृद्धि हुई है ,जिससे मैं खुद को अनदार से जागृत महसूस करती हूँ , आरती को आत्मसंघर्ष के साथ साथ पिछड़े एवं वंचित लोगों के आवाज बनने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी किया गया है ,भारत वर्ष के पटल पर इस उभरती लेखिका आरती आलोक वर्मा द्वारा महिलाओं पर एक कविता लिखा गया है ,जिसे पढ़कर हर महिला गर्व महसूस कर रही है, महिलाओं पर जिस तरह का व्यवहार हमारे समाज में किया जाता है ,उसे कवयित्री आरती आलोक वर्मा ने अपनी शब्दों में लिखा है, आप भी पढ़े आरती आलोक वर्मा की कविता…

   शीर्षक 

“औरत तेरा वजूद”

सुनो, “तुम एक औरत हो”
और हां सुनो ,”क्योंकि तुम एक औरत हो
तुम्हे यह अधिकार नहीं की तुम किसी से
किसी प्रकार की उम्मीद करो,तुम्हारा
सिर्फ और सिर्फ कर्त्तव्य है—-“

सदियों से यही तो थोपा जा रहा है तुझपे
तुम्हारा कर्त्तव्य है की तुम पीसती रहो
घर- बाहर दूसरों के मतलबों की चक्की में

तुम घर की मालकिन हो ,
वैसी मालकिन
जो सबको ससमय अपनी सेवा देती रहती हो
क्षण भर बिलम्ब किये बगैर अपने बच्चों की
जिम्मेदारियों समेत घर भर के लोगो के तमाम
नखरे उठाती हो,नहीं तो
नहीं तो सारे मिल के सारा का सारा
घर उठा लेंगे सर पर
गर्जन- तर्जन से गूंजयमान हो जाएगा तेरा घर
और  तुम?
तुम खामोशी से सुन लोगी सब, चुपचाप
क्योंकि ,पीहर से लेकर जो आई हो सीख
की हर हाल में तुम्हे अपना घर बसा लेना है

हां जी सुनती हो न ? हर हाल में
सख्त हिदायते मिली है -भाई-बंधु ,माँ- बाप
गांव- ज्वार सबसे –हां हां सबसे
उन्हे बस यही ज्ञात है
रिश्तो के अटूट रहने की सारी जिम्मेदारी
एकतरफा तुम्हारी है ,बस तुम्हारी, तो सुनो-
“तुम्हारा कर्त्तव्य है की रिश्ते हर हाल में बने रहें।

तुम्हारा दायित्व है घुट -घुट कर मरने का
घुटना तो तुम्हे घुट्टी में मिली है ,
तो त्याग- तपस्या ,समर्पण की जिम्मेदारी निभाओ
तुम्हे हक नहीं की तुम अपने दुःखों से,दुखदाताओं से
विच्छेद करो क्योंकि “तुम अबला हो”(ऐसा वो मानते हैं)
नाक कट जायेगी तेरे बाप-भाई की क्योंकि पुरूषार्थ
के दर्प से दमकती नाक उन्ही के पास है
तो झेलो कचकच का वृश्चिक दंश बिना उफ्फ किये
तय करो डोली से अरथी तक का सफर ।

पराये घर जाना है यही कहते हैं ना पीहर में
पराये घर से आई है यही कहता है ना ससुराल
तो बहलावे की स्वामिनी बनी रहो
दूसरों के छलावे में स्वयं को छलती रहो
या तय कर लो की तुम्हे क्या चाहिए
तुम्हारा हक क्या है,तुम्हारा अपना वजूद है भी की नहीं
है न?तो जब अपनी पहचान है तो
दूसरों की थोपी हुई  मानसिकता क्यों?
सिर्फ कर्त्तव्य क्यो? अधिकार क्यों नहीं ?
तो जगाओ अपना स्वाभिमान और सुनो ,
मगर उनकी नहीं ,किसी की नही अपने मन की
ताकि तुम कर सको सुखो से संधि
कर सको विच्छेद  अपने दुखकर्ताओं से
बना सको अपना घर,
बसा सको अपना जहान
सुनो ,
तुम एक औरत हो
तो हैं तेरे समता के अधिकार इसी जहान में
क्योंकि तुम एक औरत हो और हो एक इन्सान भी

–आरती आलोक वर्मा–

 

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